नव संवत्सर - २०७४: हिन्दू नववर्ष २०१७

संवत्सर एक संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'एक वर्ष'। समय की संकल्पना से उत्पन्न, संवत्सर समय के विशाल कालाचक्र का एक सूक्ष्म घटक है।

विक्रम संवत की शुरुआत ५७ ईसवी पूर्व में हुई थी। सम्राट विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में इस दिन आनंदोत्सव मनाया जाता था। सम्राट विक्रमादित्य ने इस संवत्सर की शुरुवात की थी, इसीलिए उनके नाम से ही इस संवत का नामकरण हुआ है। इस नववर्ष को भारत के विभिन्न प्रान्तों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है - जैसे की महाराष्ट्र में 'गुड़ी पाड़वा’, जम्मू-कश्मीर में 'नवरेह', सिंधियों में 'चेटी चंद', केरल में 'विशु', असम में 'रोंगली बिहू', आंध्र, तेलंगाना तथा कर्नाटक में 'उगादी' और मणिपुर में 'साजिबू नोंग्मा पन्बा चैराओबा' ।

समूचा भारत चैत्र माह से ही नववर्ष का प्रारम्भ मानता है । पुराणों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। इस समय के दौरान जलवायु और सौर प्रभावों का एक महत्वपूर्ण संगम होता है। चैत्र नवरात्रि के दौरान उपवास करके शरीर को आगामी ग्रीष्म ऋतुके लिए तैयार किया जाता है। इस समय हमारे शरीर में नया रक्त का निर्माण और संचार होता है ।

नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और ऋतु काल के पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर खाने से रक्त विकार, चर्मरोग आदि शारीरिक व्याधियां होने की संभावना नहीं रहती है तथा वर्षभर हम स्वस्थ और रोग मुक्त रह सकते हैं।

वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मनाने के विशेष कारण हैं। वसंत ऋतू प्रकृति के यौवन और श्रृंगार की ऋतू है; वृक्षों पर नए पुष्प और पात लगते हैं; चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखती है। किसानों को अपनी मेहनत का फल मिलता है - इसी समय फसलों की कटाई होती है । मौसम भी बहुत सुखद और संतुलित रहता है - न बहुत गर्म और न ही बहुत ठंड रहती है । ग्रह और नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं । किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।

ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ होता है। ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है।

जिस प्रकार अंग्रेजी कैलेंडर में हर वर्ष को एक संख्या द्वारा लक्षित किया जाता है, उसी प्रकार हिंदू कैलेंडर में हर नवीन संवत्सर को एक विशेष नाम से जाना जाता है, जो ६० वर्ष के चक्र में बदलता रहता है। सन २०१७ संवत्सरों के चक्र में ४४वां वर्ष है। इस वर्ष इस संवत्सर का नाम 'साधारण' है और इसके स्वामी शिव हैं। इस वर्ष के दौरान पैदा होने वाले शिशु बड़े होकर अक्सर व्यवसायी बनते हैं; वे धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने प्रयासों से ही आगे बढ़ते हैं और अल्प संसाधनों के साथ भी संतुष्ट रहते हैं। इस वर्ष के राजा ग्रह बुध और मंत्री ग्रह गुरु होने से योग बहुत शुभ, जो देश के लिए कल्याणकारी रहेगा

२०१७ के संवत्सर की शुरुवात सम्बंधित विवाद:

इस वर्ष संवत्सर की तिथि को लेकर लोगों में कुछ दुविधा है। प्रमुख पंचांगों तथा कैलेंडरों में भारतीय नववर्ष विक्रम संवत २०७४ का प्रारंभ अंग्रेजी दिनांक २८ मार्च २०१७ से बताया जा रहा है । भारतीय निर्णय सिंधु के अनुसार यह तिथि गलत है ।

भारतीय काल गणना के अनुसार विक्रम संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का क्षय हो रहा है अर्थात विक्रम संवत २०७३ के चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या २८ मार्च २०१७ की सुबह ८:२६ तक रहेगी तथा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा का प्रारम्भ सबेरे ८:३७ को होकर अगली सुबह ५:४५ बजे समाप्त हो जायेगी । इस प्रकार, २८ मार्च २०१७ और २९ मार्च २०१७ - दोनों ही दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा नहीँ रहेगी । शास्त्रों के अनुसार अमावस्या वेधित प्रतिपदा मान्य नहीं होती है। रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। इस कारण, २८ मार्च २०१७ अर्थात मंगलवार को चैत्र संवत्सर कर प्रारम्भ नहीं माना जा सकता । अतः, इस वर्ष, बुधवार २९ मार्च को सूर्यादय ६:३५ बजे से नव संवत्सर लगेगा।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार विक्रम संवत्सर जिस वार को शुरू होता है, पूरे वर्ष उसी वार का स्वामी राजा होता है। अतएव इस वर्ष का राजा ग्रह बुध और मंत्री ग्रह गुरु होने से योग बहुत शुभ, जो देश के लिए कल्याणकारी रहेगा।

इस बार नवरात्र भी नौ की जगह आठ दिन के होंगे। मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी का पूजन एक ही दिन होगा।

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